हम सभी मां गंगा की पावन धरा,काशी विश्वनाथ के महानगरी में महामना जी के  तप व संकल्प से रचित सर्व विद्या की राजधानी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र हैं | मानव जीवन स्वयं में ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक महान उपहार माना जाता है , फिर भी मानव प्राणी को प्रेरणा की जरूरत होती है | हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि हमें महामना जी के बगिया में इतने प्रेम व अपनत्व के साथ पढ़ने का मौका मिला | जहां तक प्रेरणा की बात है तो यह विश्व विद्यालय के नींव के समय के इतिहास में ही छिपा है | इस विश्वविद्यालय के निर्माण के स्वप्नद्रष्टा व संस्थापक महामना जी के पास किसी भी प्रकार का आर्थिक संसाधन नहीं था , फिर भी इतना सुंदर विश्वविद्यालय इस धरा पर निर्मित हो गया और आज भी दिन प्रतिदिन यह विश्वविद्यालय अपनी उसी विचारधारा को लेकर कायम है जो महामना ने दिया था -
                                       "  न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् |
                                          कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् | | "

हम सभी मां गंगा की पावन धरा,काशी विश्वनाथ के महानगरी में महामना जी के  तप व संकल्प से रचित सर्व विद्या की राजधानी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र हैं | मानव जीवन स्वयं में ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक महान उपहार माना जाता है , फिर भी मानव प्राणी को प्रेरणा की जरूरत होती है | हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि हमें महामना जी के बगिया में इतने प्रेम व अपनत्व के साथ पढ़ने का मौका मिला | जहां तक प्रेरणा की बात है तो यह विश्व विद्यालय के नींव के समय के इतिहास में ही छिपा है | इस विश्वविद्यालय के निर्माण के स्वप्नद्रष्टा व संस्थापक महामना जी के पास किसी भी प्रकार का आर्थिक संसाधन नहीं था , फिर भी इतना सुंदर विश्वविद्यालय इस धरा पर निर्मित हो गया और आज भी दिन प्रतिदिन यह विश्वविद्यालय अपनी उसी विचारधारा को लेकर कायम है जो महामना ने दिया था -
                                       "  न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् |
                                          कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् | | "

               वाकई में सपने देखना जरूरी है और उस राह में चल पड़ना भी उतना ही जरूरी | गुरु कलाम जी भी यही कहते थे - " सपने वो नहीं होते जो रात को सोने पर आते है, सपनें वो होते हैं जो रातों में सोने नहीं देते " | यह सभी विचार हमने आप गुरुजनों ( जो अभिभावक संरक्षक के रुप में हमारे साथ रहे ) के स्नेहमई शब्दों में निहित अर्थ से पाया है | इसलिए हम सभी छात्र आपके चरणो में स्व को समर्पित करते हुए यही वंदना करना चाहते हैं कि हमें आशीर्वाद प्रदान करें कि हम सब महामना के बगिया के जो अभी कली है , खिल कर कुछ ऐसे पुष्प बने जिसकी महक पूरे संसार में फैल सके और महामना जी के विचार -
                               "  न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् |
                                  कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् | | "
को भी उनके हम मानस संतान आगे बढ़ा सकें |
                                                                                        आपका आभारी
                                                                                                '
                                                                                                ' 
                                                                                   स्नातक तृतीय के सभी छात्र




                                            आप प्रेरणा हम पात्र
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महामना जी के जीव - जगत एवं प्रकृति के प्रति प्रेम व समर्पण के भाव ने रचा - एक सुंदर स्थापत्य कला का भाव लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय की बगिया | हम सभी इसी बगिया के पुष्पित-पल्लवित होने वाले छात्र हैं | हम सभी सामाजिक विज्ञान संकाय के छात्र होने के रूप में गौरव प्राप्त कर रहे है | हम सभी छात्रों ने सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत विभिन्न विषयों को पढ़कर , समझकर जितना भी ज्ञान प्राप्त किया , चाहे वह अल्प ही क्यों ना हो , परंतु उसमें कुछ विचार जो सामान्य मिले वह था - प्रेम , समर्पण , जुनून | चाणक्य का चंद्रगुप्त को शिक्षित करना - प्रेम (देशप्रेम) , समर्पण (देश की अखंडता की रक्षा के लिए कितना कष्ट सहे) व जुनून (संकल्प को पूरा कर लेना) का  एक ऐतिहासिक उदाहरण है | महात्मा गांधी जी का देश को अमानवीय शासन से मुक्त कराने के लिए सत्य , अहिंसा व सेवाभाव के रास्ते पर चलना भी तो प्रेम समर्पण व जुनून का ही एक उदाहरण है | आधुनिक समय में  गुरु कलाम जी भी एक महान उदाहरण पेश किए थे जिनके प्रेम समर्पण व जुनून ने देश को सुरक्षित , मजबूत तथा देशवासियों के अंदर प्रेरणा का भाव संचारित किया |
                इतने स्पष्ट व महान विचारों से हम सबों को शिक्षित व सिंचित करने वाले गुरुजनों को हमारा पुनः शत - शत नमन | इन्हीं सब की प्रेरणा से हम सभी पात्र (छात्र) बहुत प्रेरित हुए हैं , जिसके परिणाम के रूप में ' प्रेमेव जयते ' परिवार की नींव रखी गई है | शब्द अपने आप में पूर्णतया अर्थ स्पष्ट करने लायक हैं , जैसा कि शाब्दिक अर्थ हुआ - प्रेम में ही जीत है और उस प्रेम की राह पर चलने की ओर संकल्पित हम सभी एक परिवार की भांति है | भारतीय संस्कृति के प्रेम व समर्पण के भाव ने ही भारत को विश्व गुरु की उपाधि से नवाजा था | फिर से प्रेम समर्पण के भाव को वर्तमान भागमभाग वाली जिंदगी में शिखर पर स्थापित करने की जरूरत है | प्रेम व समर्पण के भाव से चलने वाला कोई भी पीछे नहीं रह सकता | नहीं तो इकबाल साहब का यह कथन  इतना प्रसिद्ध ना होता -   
                                       " यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से ।
                                       अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा | |
                                        कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी |
                                        सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा | | "
                भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम के विचारों वाली रही है | निश्चितरूपेण हम अगर विचार करें तो पाएंगे कि मानव के लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं होनी चाहिए , अगर वह वास्तव में मानव प्रेम के मार्ग पर चल रहा हो | क्या होगा संकीर्ण विचारधारा को पालकर , जो स्वयं के बाद नष्ट हो जाए |
             वास्तव में सामाजिक विज्ञान संकाय में पढ़ना हम सबों के लिए बहुत सुखद रहा है और एक महत्वपूर्ण बात कि इस संकाय ने हमें बहुत बड़ा प्रयोगशाला भी दिया जो पूर्णरूपेण स्वतंत्र थी | जी हां - ' समाज ' | समाज हमारे लिए प्रयोगशाला बना है ,जहां हमने अपने ज्ञान का प्रयोग किसी न किसी रूप में करते रहे हैं | देश व दुनिया की बड़ी - से - बड़ी चुनौतियां को भी हमने एक छोटे से भाग में हंसते - खेलते समाधान करने का प्रयास किया | उसकी नीतिगत चुनौतियों को समझा और नीतिगत चुनौतियों  को हटाने या कम करने की बातें भी सीखी | यह सोच " THINK GLOBAL , ACT LOCAL  "  पर आधारित हैं |
                     इन सभी विचारों के साथ आप गुरुजनों से गुजारिश करता हूं कि इस प्रेमेव जयते परिवार पर अपना आशीर्वाद , स्नेह इसी तरह बनाए रखिएगा | हम सभी यह वायदा करते हैं कि आपके यह विचार , स्नेह व आशीर्वाद से पुष्पित-पल्लवित एवं सिंचित होने वाले हम कली पूरे संसार में खिलेंगे , मुस्करायेंगे |

                                                                                        आपका

                                                                                  प्रेमेव जयते परिवार




                                                बातें कुछ ऐसी भी
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                                                         विशेष सामाजिक विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों के लिए
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            एक सामान्य वार्तालाप लोगों के बीच का | उसी से उठाया गया है यह छोटा सा संवाद | उनकी  सोच थी - वह इंजीनियर बनेगा , डॉक्टर बनेगा | यह क्या उसने तो ARTS या SOCIAL SCIENCES   में एडमिशन ले लिया | कर गया फालतू काम | यह भी कोई SUBJECT है | B .TECH करता या MEDICAL में करता तो कितना अच्छा होता | उसमें SALARY है - एक लाख , दो लाख और तो और करोड़ों के भी पैकेज हैं | ARTS में क्या करेगा ? उसमें पढ़कर भी कोई फायदा नहीं है | 3 साल समय की बर्बादी , और क्या ? बस यही तो ARTS (SOCIAL SCIENCES) में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बारे में चर्चा होती है आजकल सामान्यतः | इतिहास , राजनीति विज्ञान विषय HONS . के रूप में लेने वाले विद्यार्थियों के लिए दो शब्द और भी कड़वी हो जाती हैं |
                                          
                                                      जरा सोचें अगर एक विषय का ज्ञान इतना महत्वपूर्ण रखता तो आज आइंस्टीन , गुरु कलाम , कबीर , लुई दे ब्रोग्ली जैसे लोग इतने प्रसिद्ध ना होते |
                      आइंस्टीन जिनके बारे में कहा जाता है कि वह बचपन में अयोग्य , मंदबुद्धि कहलाए गए परंतु माता - पिता , ईश्वर एवं अपनी मेहनत पर अपार विश्वास ने उन्हें महान बना दिया | उनमें अहम् जरा भी नहीं था | इस बात का स्पष्ट उदहारण उनकी ड्राइवर के साथ हुई एक वार्तालाप से मिलती है | एक बार आइंस्टीन साहब अपने ड्राइवर के साथ कहीं भाषण देने जा रहे थे , इसी दौरान ड्राइवर ने आइंस्टीन साहब से पूछा | " क्या मैं आपकी जगह पर भाषण दे सकता हूं ? ..... आइंस्टीन साहब ने तुरंत कहा - क्यों नहीं , चलो आज तुम ही देखो मेरी जगह पर और आइंस्टीन ने तुरंत ड्राइवर की पोशाक पहन ली  और ड्राइवर ने आइंस्टीन की पोशाक | उसके बाद ड्राइवर जो आइंस्टीन के रूप में वहां STAGE पर भाषण देने गया , उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ भाषण दिया | इसके पश्चात तो वहां जोरदार तालियां बजी | सबने आइंस्टीन से कुछ प्रश्न पूछना शुरु किया है | इस पर आइंस्टीन जो  वास्तव में ड्राइवर था , आत्मविश्वास के साथ सभी प्रश्नों का उत्तर दिया | लेकिन एक प्रश्न का उत्तर उसे पता ना था , तब उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा कि यह प्रश्न इतना आसान है कि इस प्रश्न का उत्तर मेरा ड्राइवर भी दे सकता है | तब ड्राइवर के रूप में खुद आइंस्टीन साहब जो मौजूद थे उन्होंने दे दिया | यह कहानी अपने आप में इतना प्रेरणादायीं  है और यह स्पष्ट करता है कि एक महान व्यक्ति वही हो सकता है , जिसके अंदर प्रेम हो , समर्पण हो और जुनून तो होना ही है तभी तो वह कोई कार्य कर पाएगा तो इस प्रेम , समर्पण की इस कहानी से इतना हमें जरुर याद रखना चाहिए कि हमें कभी भी सिर्फ अपने  स्वार्थ सिद्धि की पूर्ति के लिए कार्य नहीं करना चाहिए , बल्कि हमारे अंदर भी सेवाभाव , प्रेम , आदर  होना चाहिए |
                                दूसरी कहानी है गुरु कलाम की | जी हां - गुरु कलाम जो विज्ञान के छात्र व शिक्षक रहे | जिस विज्ञान विषय के बारे में एक नकारात्मक भ्रांति फैली हुई है कि इसमें वैज्ञानिक पूरी तरह व्यस्त रहते हैं , समाज से कोई मतलब नहीं | परंतु गुरु कलाम का नाम लेने पर सभी भ्रांतियां दूर हो जाती है | सपने भले ही उन के छात्र जीवन में पायलट का पूरा न हुआ तो क्या हुआ | सपने उन्होंने देखे थे तभी तो सुखोई विमान को उड़ाकर 74 वर्ष की अवस्था में पूरा कर लिया अपना बचपन का सपना | भले ही सपने देर से पूरे हुए हो , लेकिन पूरे तो हुए | इस बीच जो देश को ज्यादा जरूरत थी वह भी गुरु कलाम ने दे दिया , शायद पायलट बनकर इतनी प्रसिद्धि .....?...मिलती | इसलिए इंसान को हमेशा अपने पथ पर चलने की सलाह दी जाती है, क्योंकि एक अंधेरी रात के बाद सुबह का उजाला निकलता है |
                      कुछ ऐसी ही कहानी है  - लुई दे ब्रोग्ली की | इतिहास विषय में प्रतिष्ठा हासिल करने वाले ब्रोग्ली अपने रुचि के अनुरुप विज्ञान के जगत में भी योगदान देकर 1929 ईस्वी में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया |
इन सब प्रेरणादायी  कहानियों के बाद तो हम निश्चितरूपेण कह सकते हैं कि मानव के लिए रास्तें अनेक है | जरा सोचिए  - कबीर के बारे में , जिन की शिक्षा - दीक्षा बहुत ही साधारण थी , फिर भी उनके द्वारा कही गई बातें आज भी  प्रासंगिक है वर्तमान समाज के लिए | तो सोचे कि मानव  जिस रास्ते पर चल रहा है या फिर यूं कहें कि हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं , अगर परिस्थितिवश भी उस रास्ते पर हमें चलना पड़ रहा हो तो भी हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए | मंजिल खुद - ब - खुद आपको सफर के दौरान मिल जाएगी | बस हिम्मत बनाए रखें |
                                    आज अगर इंजीनियर की बात अधिक होती है और ARTS की कम तो विषय का दोष नहीं है , बल्कि हमारी मेहनत शायद इस स्थिति के लिए उत्तरदायी है | हर एक इंजीनियर की स्थिति अच्छी नहीं है , अगर किन्ही की स्थिति अच्छी है तो मेहनत करने वाले की | हम सभी जानते हैं कि इंजीनियर अधिक पढ़ते  है , क्रमवार अध्ययन करना पड़ता है | फिर  भी हम जानकर बस अपने को ARTS का विद्यार्थी मानकर , समझकर खुद को सामाजिक परिदृश्य में कमतर आंकने लगते हैं , जो हमारी भारी भूल है | अगर हम भी पूरे उत्साह जोश के साथ क्रमवार अध्ययन करें तो अनेकानेक रास्ते खुद खुले मिलेंगे - हमारे लिए |  साथ ही कहीं रास्ते बंद भी दिखने लगे तो एक नया रास्ता खुद बना देंगे ............ जी हां - ..........खुद बना देंगे......... खुद बना देंगे | क्योंकि आप सबों का जो आशीर्वाद , स्नेह हमारे साथ है |
                                                   हमें तो अब लगता है कि समाज को सामाजिक वैज्ञानिकों की वर्तमान समय में अधिक संख्या में जरुरत है क्योंकि जिस तरह से पूरी दुनिया भाग रही है उससे वैश्विक जगत में असंतुलन दिख रहा है | अतः इस असंतुलन को पुनः संतुलित करने की जिम्मेदारी हम सभी भविष्य के सितारों पर ही हैं |


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